छत्तीसगढ़ अंचल में कंडरा जाति बांस शिल्पी मानी जाती है यह जाति परंपरागत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी बांस के द्वारा हस्त शिल्प का निर्माण करती है। बांस की अधिकांश वस्तुएं ग्रामीण दैनिक जरूरतों में काम आने वाली है। इसलिए ये बहुत बड़ी संख्या में बनती है यह कड़रा, बंसोडो की आजीविका का प्रमुख साधन है। हरा (कच्चा) बांस न मिलने के कारण सुखा बांस को पानी में डुबाकर रखते है। सबसे पहले एक विशेष प्रकार की घुरी, कर्री या कटारी से बांस की लम्बी पट्टियां छिली जाती है उसके बाद इन पट्टियों का पुनः छीलकर और पतला किया जाता है। जो मोटी काड़िया निकाली जाती है उनसे टुकना, टुकनी, छितका, पर्रा आदि बनाया जाता है।

ग्राम ननकट्ठी निवासी बांस शिल्पकार धरमू राम कंडर्रा ने नवभारत पत्रकार आनंद साहू से चर्चा करते हुए बताया कि यह हम लोगों की पुस्तैनी धंधा है लेकिन बढ़ती हुई मंहगाई के कारण मुश्किल से जीविका उपार्जन ही हो पा रहा है। वन मंडल अधिकारी दुर्ग द्वारा बंसोड़ बही (पं.नं 44) के तहत् शासकीय धमधा डिपों से प्रतिवर्ष 400 से 500 बांस मिलता है जो कि 1600 रूपये सैकड़ा से लेकर 2000 रूपये सैकड़ा में मिलता है। लेकिन इतने बांसो से हम लोगों का गुजारा नही चल पाता है। डिपो से तीन किस्म के बांस छोटा, मध्यम, व बड़ा मिलता है। लेकिन बड़ा बांस कभी कभार ही मिल पाता है। इसलिए निजी बांस डिपों से 100 से 150 रूपये में एक बांस खरीदना पड़ता है। और उससे सामग्री तैयार कर बेचने में पर्याप्त रोजी मजदूरी भी नही निकल पाता है।
धरमू राम कंडर्रा ने बताया कि बांस की वस्तुएं बनाने के लिए वैसे तो हरे बांस की आवश्यकता है। लेकिन अब हरा बांस नही मिल पाता है सूखा बांस खरीदकर उसे पानी में डुबाकर रखते है। जिसे कटारी से बांस लंबी पट्टिया छीलकर टुकना-टुकनी, पर्रा, झउआ, खुमरी यह बांस की बनी बड़ी टोपी होती है इसका उपयोग बारिश तथा धूम से बचाव के लिए किया जाता है। सूपा, सुपली इस का इस्तेमाल विवाह संस्कार में किया जाता है। बिज बौनी को किसान बीज बोने समय काम में लाते है। पर्रा, बिजना, चुरकी यह छोटी टुकनी होती है जिसे विवाह के समय दुल्हन इसमें धान भरकर खड़ी रहती है।











